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संकल्प का महत्व और अर्थ

सनातन धर्म कार्यों में संकल्प का विशेष महत्व होता है आमतौर पर बहुत कम लोगों को इसका महत्व और अर्थ पता होता है इसलिये नित्य कर्म में सर्व प्रथम इस विषय को लिया है

आप संकल्प में अपने पूज्य ईश्वर को यह विवरण देते हैं की आप किस काल में किस लोक में किस वर्ष मास तिथि वार इत्यादि में, किस स्थान पर, किस मनोकामना के पूर्ति हेतु क्या पूजन, जप, अनुष्ठान आदि करने का प्रण करते है जैसे हम कोई भी कार्य बिना प्रयोजन के नहीं करते उसी तरह भगवान पूजन का भी प्रयोजन संकल्प के माध्यम से ईश्वर को स्पष्ट करते है आइये संकल्प का अर्थ समझते हैं जिससेआपको न केवल इसका महत्व ज्ञात होगा बल्कि सनातन धर्म का विज्ञान कितना उच्च स्तर का था इसका भी ज्ञान प्राप्त होगा  

संकल्प का अर्थ

संक्षिप्त संकल्प: 

ऊँ विष्णु विष्णुविष्णु(अथवा ऊंविष्णवे नम: ऊंविष्णवे नम:  ऊंविष्णवे नम)  

देश और काल का विवरण 

“ॐश्रीमद भगवतो महा पुरुषस्यविष्णुराजाज्ञापर्वतमानस्यअघब्रह्माणोहनिदवतियपरारधे श्री श्वेत वाराहकल्पेवैवस्वतमनवनतरे अष्ट विंशतितमेकलियुगेकलिप्रथमचरणे बौद्ध अवतारे भू लोकेजंबूद्वीपे भारत वर्षेंआर्यावर्तेकदेशांतरगते

समय तिथी आदि का विवरण और संकल्प 

(अमुक (वर्ष का नाम)(अमुक)माह का नाम) मासे, (अमुक(शुक्ल्, कृष्ण) ्षे (अमुक) तिथा, (अमुक) वासरे,अह्म (अमुक नाम) ग़ोत्रे (ग़ोत्र का नाम) सर्वकर्मसुशुद्ध्यर्थ श्रुति समृतिपुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थ श्री भगवत प्रीतय्रथ च (अमुक) कर्म करिषये” 

महापुरुष भगवान श्रीविष्णु की आज्ञा से प्रेरित हुए भगवान ब्रह्मा के दूसरे परार्ध (ब्रह्मा जी की आयु के दूसरे परार्ध में – इसके बारे में विस्तार से इधर बताया गया है),श्री श्वेत वाराहकल्प में (1000 महायुग (चतुर्युग) का एक कल्प होता है एक कल्प ब्रह्मा जी का एक दिन होता है, ब्रह्मा जी की आयु 100 दिव्य वर्षों की होती है जिसके 50 वर्ष बीत चुके है (प्रथम परार्ध)  अभी 51 साल चल रहा है (द्वतीयपरार्ध) कल्प की गणना और हमारे प्रथ्वी लोक के कितने साल से एक कल्प बनता है यह विस्तार से इधर बताया गया है)वैवस्वतमन्वंतरमें(प्रत्येक महायुगयानि एक कल्प में 14 मनवंतर (मनु) होते हैं और इस समय वैवस्वत मनु जो कि सातवें मनु है चल रहा हैमनवंतर के बारे में विस्तार से इधर बताया गया है)अष्ट विंशतितमे

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