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Introduction to Jyotish

आधुनिक जीवनशैली में वैदिक ज्ञान का योगदान  सनातन धर्म ही सारे संसार का सबसे प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ धर्म है सनातन धर्म के मूल ग्रंथ वेदों से ही सम्पूर्ण विश्व में सभी  calendar चल रहे हैं। वेदों में विस्तृत खगोल शास्त्र के ज्ञान से ही सारे विश्व के क्रिया कल्प और व्यापार चल रहा है। इसका अर्थ यह है की विश्वके सभी देशों में दिन (वार), सप्ताह, महीना, साल, ऋतुयें और पूरा calendar वैदिक संस्कृति की ही देन है।  Calendar शब्द भी संस्कृत शब्द “कालांतर” से आया है, कालांतर का अर्थ है एक काल (समय) से दूसरे समय पे जाने का अंतर (एकsecond से दूसरे second, एक minute से दूसरे minute, एक घंटे से दूसरे घंटे, एक दिन से अगले दिन, माह से अगले माह इत्यादि)  वेदों का खगौलिक ज्ञान भारतवासियों से अरबी निवासियों ने सीखा उनके द्वारा यह ज्ञान युरोपीयन देशों में पहुँचा, लेकिन इन सभी देशोंकी बोल चाल भाषाओं में संस्कृत भाषा के स्पष्ट उच्चारण की योग्यता नहीं थी, कुछ तो शब्द उनकी वर्णमाला में ही नहीं थे और इसीकारण से कालांतर से calendar नाम पड़ गया।  जो विदेशी calendar हम आज कल उपयोग में लाते है वह अनेकों परिवर्तनों और बदलावों से गुज़र चुका है पर उसका मूल स्रोत वैदिकखगोल ज्ञान ही है।  भारतीय ऋषियों का खगोल विज्ञान सम्पूर्ण है अर्थात उन्होंने चंद्रमा की पृथ्वी की परिक्रमा की गति , पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा गति, सौर्यमंडल के अन्य ग्रह, राशि नक्षत्रों की गणित आदि की परस्पर निर्भरता को सम्मिलित कर कालांतर या पंचांग की रचना की।  इस अथाह ज्ञान को समझना विदेशी सभ्यताओं के लिए बहुत कठिन था इसलिए अलग अलग देशों के calendar अपूर्ण है। किसी नेसूर्य, किसी ने चंद्रमा तो किसी ने नक्षत्रों के आधार पर ही अपने calendar बना कर प्रचलित किए।  पंचांग (भारतीय calendar) क्या है।  समय का ज्ञान (या कब कौन सा वार, तिथि,  वर्ष चल रहा है… ) पाँच खगौलिक (हमारे सौर्यमंडल से सम्बंधित) गतिविधियों परआधारित है जो काल (समय) के पाँच अंग हैं:  1. तिथि 2. वार 3. नक्षत्र 4. योग 5. करण इन पाँच अंगों के अलावा पंचांग में और भी अंगों जैसे अयन, कृष्ण/शुक्ल पक्ष, ऋतु, चोगड़िया, मुहूर्त, प्रहर आदि का वर्णन भी होता है।  इस विषय पे विस्तार से जानकारी जानने के लिए आप हमसे email ————— पर संपर्क कर सकते हैं। 

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Hindu (Sanatan) dharm

जिसको सारे विश्व में हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है वह असल में सनातन धर्म या वर्णाश्रमधर्म कहलाता है।  सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म का कहा जाना कुछ सदियों पहले ही शुरू हुआ जिसका कारण ईरानी निवासी हैं जो “स” का उच्चारण ” ह” किया करते थे और वैदिक काल में हमारे पूर्वज चूकिसिंधु नदी के पार रहा करते थे तो ईरानी उन्हें सिंधु की जगह हिंदू कहते थे बाद में मुग़लों के शासन काल में मुग़ल भी भारतवासियों को हिंदू कहने लगे।  सनातन का अर्थ है जिसका न आदि (प्रारंभ) है न ही अंत अर्थात जिसकी उपस्थिति हमेशा से ही या सृष्टि के आरंभ से ही हो । इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है की अन्य सभी धर्म किसी मनुष्य के द्वारा स्थापित हुए जिन्होंने अपनी विचारधारा से अनुयायी बनाए। जबकि सनातन धर्म किसी मनुष्य के द्वारा शुरू नहीं किया गया। सनातन का अर्थ तो समझना आसान है पर धर्म क्या है इसको समझना थोड़ा कठिन है कई विद्वानों के विचार में धर्म का अर्थ है “प्रकृति के बनाए हुए नियम (क़ानून)” जिनका संबंध किसी सम्प्रदाय से नहीं है ये तो वो नियम है जो सृष्टि के आरंभ से जबसे जीवन की उत्पत्ति हुई तभी से हैं, और ये नियम सभी प्राणियों पर लागू होते है उदाहरण के लिए योग अभ्यास वह विज्ञान है जो मनुष्य शरीर को प्रकृति के अनुरूप कर स्वस्थ रखता है चाहे उस मनुष्य का कोई भी धर्म हो…योग की ही तरह आयुर्वेद और ज्योतिष विज्ञान भी मानवता को सनातन धर्म ग्रंथों की ही देन है ।  पुरातन ऋषि मुनियों ने तो प्रक्रति के इन नियमों को योग और तपोबल से जाना और उससे ही प्राचीन विज्ञान की उत्पत्ति हुई। प्रकृति के नियमों को समझने का अर्थ है  1. हमारे सौर्य मंडल का ज्ञान, पंचांग, वर्ष, मास, तिथि, वार, ऋतु, राशि, नक्षत्र के ज्ञान से ही मनुष्य के सभी क्रिया-कल्प संभव होते हैं  2. चंद्रमा, सूर्य और दूसरे ग्रहों के पृथ्वी पर जीवों पर प्रभाव (जो ज्योतिष का विषय है)  3. योग विज्ञान जो आदर्श जीवन यापन की पद्धति है,  4. वनस्पति विज्ञान औषधि और रोग आदि की जानकारी  5. स्वस्थ जीवन के लिए आहार कैसा हो (सात्विक अथवा तामसिक)  सनातन धर्म को वर्णाश्रमधर्म भी कहा गया है। सनातन धर्म की नींवहै वेद। वेद विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ है जिनके बारे में उपयोगी चर्चा हमने आगे की है। सनातन धर्म अनुयायी वेदों का अनुसरण करते थे जिसे वर्णाश्रम परम्परा या वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है।हिंदूओं की सही पेह्चान वर्णाश्रम है। वैदिक वर्णाश्रम धर्म का अनुसरण जब तक होता रहा भारतवर्ष में सभी लोग खुशहाल, स्वस्थ और समृद्ध थे। आधुनिक काल की सारी सामाजिक समस्यायें विदेशी आक्रांताओं का भारत पर लम्बे काल तक शासन है जिसके कारण वैदिक ज्ञानऔर वर्णाश्रम परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त हो गई। वर्णाश्रम:  वेदों के अनुसार परमात्मा ने समाज के नागरिकों को उनके कार्य और गुणों के आधार पर चार वर्णों में विभाजित किया जो इस प्रकार हैं चार वर्ण और उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी 1. ब्राह्मण – बुद्धिजीवी, पुरोहित, वेदों का ज्ञान रखने वाले, शिक्षक, सदाचारि वर्ग को ब्राह्मण का पद प्राप्त होता था जो समाज के सभी वर्गों के मार्ग प्रदर्शक भी हुआ करते थे। 2. क्षत्रिय – साशक, राजा, रक्षक, युद्धकला में निपुण आदि व्यक्तियों को क्षत्रिय कहा जाता था 3. वैश्य – व्यापारी वर्ग  4. शूद्र – ऊपर लिखे सभी कार्यों के अलावा और कोई भी कार्य करने वालों को शूद्र कहा जाता था वर्णाश्रम व्यवस्था में जन्म से सभी को शूद्र कहा गया है और व्यक्ति के गुण और कार्य / व्यवसाय के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र की संज्ञा दी गयी थी। इन चार वर्णों के अलावा कुछ और वर्ण थे जो कि असभ्य, अपराधिक या असामाजिकप्रवत्ति के कारण राक्षस, दस्यु या चांडाल आदि कहलाते थे।  वर्ण व्यवस्था समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए बहुत कारगर थी लेकिन आज के आधुनिक युग में इसको जाती प्रथा के साथ जोड़ कर उसका अर्थ बिलकुल ग़लत समझा है। वर्ण का जाती से कोई सम्बंध नहीं । वर्ण तो व्यक्ति के गुण, कार्य/ व्यवसाय और उसकी रुचि के संज्ञक थे, अर्थात एक शूद्र की संतान भी अगर चाहे तो अपने परिश्रम से वैश्य क्षत्रिय या ब्राह्मण बन सकती थी। इसी तरह से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने पर भी अगर उसके कर्म, रुचि या गुण वैश्य शूद्र या क्षत्रिय जैसे हों तो वह व्यक्ति वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र कहलाता था । सभी वर्ण महत्वपूर्ण थे और सभी वर्णों को समाज में सम्मान प्राप्त था। आज के आधुनिक समाज में जातीवाद के कारण जो समाज में बुराइयाँ (छुआ छूत या भेद भाव ) व्याप्त हैं, वर्णाश्रम व्यवस्था में नहीं थीं।  चार आश्रम आश्रम व्यवस्था व्यक्ति की आयु १०० वर्ष को आधार मान कर मनुष्यों के जीवनकाल को चार अवस्थाओं (आश्रम) में बाँटा गया था।  1. ब्रह्मचर्य आश्रम – २५ वर्ष तक की आयु तक ज्ञानार्जन (विध्या ग्रहण करना) ही प्रमुख कार्य होता था।  2. ग्रहस्त आश्रम – जैसा कि नाम से ही पता पड़ता है २५ से ५० वर्ष की आयु व्यक्ति को विवाहित जीवन के लिए उपयुक्त बताया गया है 3. वानप्रस्थ आश्रम – ५० वर्ष की आयु के पश्चात, ग्रहस्त जीवन त्याग कर अपने परिवार के प्रति सभी कर्तव्यों को पूरा कर और सारी ज़िम्मेदारियों को अपने बच्चों के हाथ दे कर वन प्रस्थान करना चाहिए। वन का अर्थ असल में घने जंगल में जाना नहीं था बल्कि ईश्वर ध्यान और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए और समाज कल्याण के कार्यों के लिए ऋषि मुनियों के आश्रम जो शहर या क़स्बों से दूर शांत स्थानो या वनों में होते थे वहाँ प्रस्थान करने को वानप्रस्थ आश्रम कहा जाता था 4. सन्यास आश्रम – ७० साल के उपरांत त्यागी सन्यासी की तरह जीवन यापन करना उपयुक्त बताया गया था। 

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संकल्प का महत्व और अर्थ

सनातन धर्म कार्यों में संकल्प का विशेष महत्व होता है आमतौर पर बहुत कम लोगों को इसका महत्व और अर्थ पता होता है इसलिये नित्य कर्म में सर्व प्रथम इस विषय को लिया है आप संकल्प में अपने पूज्य ईश्वर को यह विवरण देते हैं की आप किस काल में किस लोक में किस वर्ष मास तिथि वार इत्यादि में, किस स्थान पर, किस मनोकामना के पूर्ति हेतु क्या पूजन, जप, अनुष्ठान आदि करने का प्रण करते है जैसे हम कोई भी कार्य बिना प्रयोजन के नहीं करते उसी तरह भगवान पूजन का भी प्रयोजन संकल्प के माध्यम से ईश्वर को स्पष्ट करते है आइये संकल्प का अर्थ समझते हैं जिससेआपको न केवल इसका महत्व ज्ञात होगा बल्कि सनातन धर्म का विज्ञान कितना उच्च स्तर का था इसका भी ज्ञान प्राप्त होगा   संकल्प का अर्थ संक्षिप्त संकल्प:  ऊँ विष्णु विष्णुविष्णु(अथवा ऊंविष्णवे नम: ऊंविष्णवे नम:  ऊंविष्णवे नम)   देश और काल का विवरण  “ॐश्रीमद भगवतो महा पुरुषस्यविष्णुराजाज्ञापर्वतमानस्यअघब्रह्माणोहनिदवतियपरारधे श्री श्वेत वाराहकल्पेवैवस्वतमनवनतरे अष्ट विंशतितमेकलियुगेकलिप्रथमचरणे बौद्ध अवतारे भू लोकेजंबूद्वीपे भारत वर्षेंआर्यावर्तेकदेशांतरगते समय तिथी आदि का विवरण और संकल्प  (अमुक (वर्ष का नाम)(अमुक)माह का नाम) मासे, (अमुक(शुक्ल्, कृष्ण) ्षे (अमुक) तिथा, (अमुक) वासरे,अह्म (अमुक नाम) ग़ोत्रे (ग़ोत्र का नाम) सर्वकर्मसुशुद्ध्यर्थ श्रुति समृतिपुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थ श्री भगवत प्रीतय्रथ च (अमुक) कर्म करिषये”  महापुरुष भगवान श्रीविष्णु की आज्ञा से प्रेरित हुए भगवान ब्रह्मा के दूसरे परार्ध (ब्रह्मा जी की आयु के दूसरे परार्ध में – इसके बारे में विस्तार से इधर बताया गया है),श्री श्वेत वाराहकल्प में (1000 महायुग (चतुर्युग) का एक कल्प होता है एक कल्प ब्रह्मा जी का एक दिन होता है, ब्रह्मा जी की आयु 100 दिव्य वर्षों की होती है जिसके 50 वर्ष बीत चुके है (प्रथम परार्ध)  अभी 51 साल चल रहा है (द्वतीयपरार्ध) कल्प की गणना और हमारे प्रथ्वी लोक के कितने साल से एक कल्प बनता है यह विस्तार से इधर बताया गया है)वैवस्वतमन्वंतरमें(प्रत्येक महायुगयानि एक कल्प में 14 मनवंतर (मनु) होते हैं और इस समय वैवस्वत मनु जो कि सातवें मनु है चल रहा हैमनवंतर के बारे में विस्तार से इधर बताया गया है)अष्ट विंशतितमे

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