जिसको सारे विश्व में हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है वह असल में सनातन धर्म या वर्णाश्रमधर्म कहलाता है। 


सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म का कहा जाना कुछ सदियों पहले ही शुरू हुआ जिसका कारण ईरानी निवासी हैं जो "स" का उच्चारण " ह" किया करते थे और वैदिक काल में हमारे पूर्वज चूकिसिंधु नदी के पार रहा करते थे तो ईरानी उन्हें सिंधु की जगह हिंदू कहते थे बाद में मुग़लों के शासन काल में मुग़ल भी भारतवासियों को हिंदू कहने लगे। 


सनातन का अर्थ है जिसका न आदि (प्रारंभ) है न ही अंत अर्थात जिसकी उपस्थिति हमेशा से ही या सृष्टि के आरंभ से ही हो । इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है की अन्य सभी धर्म किसी मनुष्य के द्वारा स्थापित हुए जिन्होंने अपनी विचारधारा से अनुयायी बनाए। जबकि सनातन धर्म किसी मनुष्य के द्वारा शुरू नहीं किया गया।


सनातन का अर्थ तो समझना आसान है पर धर्म क्या है इसको समझना थोड़ा कठिन है कई विद्वानों के विचार में धर्म का अर्थ है "प्रकृति के बनाए हुए नियम (क़ानून)" जिनका संबंध किसी सम्प्रदाय से नहीं है ये तो वो नियम है जो सृष्टि के आरंभ से जबसे जीवन की उत्पत्ति हुई तभी से हैं, और ये नियम सभी प्राणियों पर लागू होते है उदाहरण के लिए योग अभ्यास वह विज्ञान है जो मनुष्य शरीर को प्रकृति के अनुरूप कर स्वस्थ रखता है चाहे उस मनुष्य का कोई भी धर्म हो...योग की ही तरह आयुर्वेद और ज्योतिष विज्ञान भी मानवता को सनातन धर्म ग्रंथों की ही देन है । 


पुरातन ऋषि मुनियों ने तो प्रक्रति के इन नियमों को योग और तपोबल से जाना और उससे ही प्राचीन विज्ञान की उत्पत्ति हुई। प्रकृति के नियमों को समझने का अर्थ है 

1. हमारे सौर्य मंडल का ज्ञान, पंचांग, वर्ष, मास, तिथि, वार, ऋतु, राशि, नक्षत्र के ज्ञान से ही मनुष्य के सभी क्रिया-कल्प संभव होते हैं 
2. चंद्रमा, सूर्य और दूसरे ग्रहों के पृथ्वी पर जीवों पर प्रभाव (जो ज्योतिष का विषय है) 
3. योग विज्ञान जो आदर्श जीवन यापन की पद्धति है, 
4. वनस्पति विज्ञान औषधि और रोग आदि की जानकारी 
5. स्वस्थ जीवन के लिए आहार कैसा हो (सात्विक अथवा तामसिक) 

सनातन धर्म को वर्णाश्रमधर्म भी कहा गया है।

सनातन धर्म की नींवहै वेद। वेद विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ है जिनके बारे में उपयोगी चर्चा हमने आगे की है। सनातन धर्म अनुयायी वेदों का अनुसरण करते थे जिसे वर्णाश्रम परम्परा या वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है।हिंदूओं की सही पेह्चान वर्णाश्रम है। वैदिक वर्णाश्रम धर्म का अनुसरण जब तक होता रहा भारतवर्ष में सभी लोग खुशहाल, स्वस्थ और समृद्ध थे।

आधुनिक काल की सारी सामाजिक समस्यायें विदेशी आक्रांताओं का भारत पर लम्बे काल तक शासन है जिसके कारण वैदिक ज्ञानऔर वर्णाश्रम परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त हो गई।

वर्णाश्रम

वेदों के अनुसार परमात्मा ने समाज के नागरिकों को उनके कार्य और गुणों के आधार पर चार वर्णों में विभाजित किया जो इस प्रकार हैं

चार वर्ण और उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी

1. ब्राह्मण - बुद्धिजीवी, पुरोहित, वेदों का ज्ञान रखने वाले, शिक्षक, सदाचारि वर्ग को ब्राह्मण का पद प्राप्त होता था जो समाज के सभी वर्गों के मार्ग प्रदर्शक भी हुआ करते थे।
2. क्षत्रिय - साशक, राजा, रक्षक, युद्धकला में निपुण आदि व्यक्तियों को क्षत्रिय कहा जाता था
3. वैश्य - व्यापारी वर्ग 
4. शूद्र - ऊपर लिखे सभी कार्यों के अलावा और कोई भी कार्य करने वालों को शूद्र कहा जाता था

वर्णाश्रम व्यवस्था में जन्म से सभी को शूद्र कहा गया है और व्यक्ति के गुण और कार्य / व्यवसाय के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र की संज्ञा दी गयी थी। इन चार वर्णों के अलावा कुछ और वर्ण थे जो कि असभ्य, अपराधिक या असामाजिकप्रवत्ति के कारण राक्षस, दस्यु या चांडाल आदि कहलाते थे। 

वर्ण व्यवस्था समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए बहुत कारगर थी लेकिन आज के आधुनिक युग में इसको जाती प्रथा के साथ जोड़ कर उसका अर्थ बिलकुल ग़लत समझा है। वर्ण का जाती से कोई सम्बंध नहीं । वर्ण तो व्यक्ति के गुण, कार्य/ व्यवसाय और उसकी रुचि के संज्ञक थे, अर्थात एक शूद्र की संतान भी अगर चाहे तो अपने परिश्रम से वैश्य क्षत्रिय या ब्राह्मण बन सकती थी। इसी तरह से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने पर भी अगर उसके कर्म, रुचि या गुण वैश्य शूद्र या क्षत्रिय जैसे हों तो वह व्यक्ति वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र कहलाता था । सभी वर्ण महत्वपूर्ण थे और सभी वर्णों को समाज में सम्मान प्राप्त था। आज के आधुनिक समाज में जातीवाद के कारण जो समाज में बुराइयाँ (छुआ छूत या भेद भाव ) व्याप्त हैं, वर्णाश्रम व्यवस्था में नहीं थीं। 

चार आश्रम

आश्रम व्यवस्था व्यक्ति की आयु १०० वर्ष को आधार मान कर मनुष्यों के जीवनकाल को चार अवस्थाओं (आश्रम) में बाँटा गया था। 

1. ब्रह्मचर्य आश्रम - २५ वर्ष तक की आयु तक ज्ञानार्जन (विध्या ग्रहण करना) ही प्रमुख कार्य होता था। 
2. ग्रहस्त आश्रम - जैसा कि नाम से ही पता पड़ता है २५ से ५० वर्ष की आयु व्यक्ति को विवाहित जीवन के लिए उपयुक्त बताया गया है
3. वानप्रस्थ आश्रम - ५० वर्ष की आयु के पश्चात, ग्रहस्त जीवन त्याग कर अपने परिवार के प्रति सभी कर्तव्यों को पूरा कर और सारी ज़िम्मेदारियों को अपने बच्चों के हाथ दे कर वन प्रस्थान करना चाहिए। वन का अर्थ असल में घने जंगल में जाना नहीं था बल्कि ईश्वर ध्यान और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए और समाज कल्याण के कार्यों के लिए ऋषि मुनियों के आश्रम जो शहर या क़स्बों से दूर शांत स्थानो या वनों में होते थे वहाँ प्रस्थान करने को वानप्रस्थ आश्रम कहा जाता था
4. सन्यास आश्रम - ७० साल के उपरांत त्यागी सन्यासी की तरह जीवन यापन करना उपयुक्त बताया गया था।